गुरुवार, 14 जून 2007

बीरबल री खोज -4 (समापन किस्‍त)

बादशा रे मन मायं आ आयगी क ओ जको कोई मिनख है म्‍हारे दरबार री शोभा हो सके है। अर बादशा बिण सिपाई ने बोल्‍यो क जया पगां अठे आयो है बियां पगां ही पाछो जा अर उण मिनख न साथे लेईने आईजे। बिचारो सिपाई मन मं विचार करियो के बादशा रो माथे खराब होग्‍यो दिखे है पण राजा, जोगी, आग अर कंवारी कन्‍या रा हठ री बात ध्‍यान मं आणे सुं बो सिपाई तो उल्‍टा पगां ही पाछो घिरगो अर बीरबल रे घरां आय न बीरबल नं बोल्‍यो अरे भाइ बीरबल तें तो म्‍हारी मदद करी ही पण आ दिखे है क बादशा रो भोगनो खराब होग्‍यो, म्‍हे जियां ही आपरी दियोडी खडी बादशा रे सामे राखी बियां ही बादशा रो फरमान होयो के जिण आदमी म्‍हने (सिपाई नं) आ खडी दीनी है उण आदमी ने म्‍हारे सामने हाजर कर। मण म्‍हारी भलमाणसत क चालतां म्‍हारी आ अरज है के भाई बीरबल आप बादशा रे दरबार मं हाजर मत होओ, म्‍हे बादशा ने आ बता देसूं क बण आदमी आणे सु मना कर दिनों। बीरबल रे मन मं विचार आयो क ओ सिपाई बात तो ठीक ही कर है पण बादशा रे दरबार मं एक बार तो जरूर जासूं चाय किं भी हो आ सोच अर बीरबल बणं सिपाई रे मना करतां-करतां उण रे साथे हो लियो अर अकबर बादशा रे दरबार मं हाजर हुयो। बीरबल आपरी गद्दी छोड अर सामां आयो अर बीरबल ने गळ लगार कयो हो क म्‍हारा नवरत्‍नां रो एक रत्‍न आज म्‍हने और मिल गयो है। उणरे बाद में बीरबल अकबर रा दरबार मायं जियो जड तक अकबर रा नवरत्‍नां माय सबसूं हुसियार नवरत्‍न रे रूप मं रयो। (समाप्‍त)
(मुझे स्‍वयं यह लगता है कि मेरे प्रयास में कहीं कुछ कमी है लेकिन फिर भी आपसे उम्‍मीद करता हूं कि आप मेरा उत्‍साहवर्धन करते रहेंगे)

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

acha lagega agar aap hindi mai likhe.