दरबार लाग्योडो हो अकबर आपरी गदी पर बैठयो दरबारयां री बातां सुण रयो हो इतेक मं बो सिपाई अकबर नं नीजर आयो र अकबर बादशा बोल्यो रे सिपाई तुं अतरा दिनां कठै हो सिपाई बोल्यो मालकां आपरी हाजरी बजावणी ही जकी बजाय न आयो हूं आप उण दिन बाग में घूमता-घूमता बोल्या हा क जा रे ल्या म्हारी हिम्मत कोनी हुई ही क आप काई चावो हो म्हे तो चाल पडयो फिरतो'फिरतो जियां किं बण पडयो है म्हे आपरी सेवा मं अरपण करूं हू आज चावो तो म्हने मारो या तारो अती बात बोल अर चुप होयग्यो अर बादशा री सिकल देख है बादशा सोचिया क हॉ बणदिन म्हे इने कयो हो, देखां कांई ल्यायो है अर बादशा बोल्यो ल्या कांई ल्यायो है पेश कर जणे बो कांधा माथ उंचियोडो एक बोरो नीचे राखियो अर बोल्यो आ खडी(जिप्सम) है अकबर समझ गयो क जको कोई आ खडी इण सिपाई नं दीनी है बो अणुतो हुसियार अर चालबाज आदमी हो सक है।
(समय की कमी के कारण आज इतना ही लिख पाया हूं क्षमाप्रार्थी हूं।)
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बृहस्पतिवार, 7 जून 2007
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2 टिप्पणियां:
मस्त मारवाडी... मजो आ गयो...
अरे वह! मज़ा आ गया अपनी देश की भाषा पढ़ के! हिंदी लिखने के लिए अगर आपको ज़्यादा समय लग रहा है तो मैं आप को quillpad.in का सुझाव देना चाहूँगा|
राजीव
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