मंगलवार, 29 मई 2007

मारवाड़ी

मारवाड़ी भाषा में आप को एक कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ आशा है आप पसंद करेंगे -

कागलो
एक बार एक कागलो हो, बो इने-बिने फिरतो-फिरतो गरमी क कारण तीसां मरण लाग्यो जणे अठिने-बठिने उडतो-उडतो पाणी कठई दिख जावे आ सोचतो-सोचतो भर गरमी मं थाकगो पण पाणी कठई नजर कोनी आयो, बो सोचण लागो क जीवङा आज तो पाणी बिना मर जांवाला, भगवान् भली करे, एक माटी को घड़ो एक पेड़ क नीचे पङ्यो नीजर आयगो, बी कागले री आंखां मं चमक आगी, अर बो तो घड़े काने उड़ान भरी अर जा बेठ्यो बी घड़े माथे अर बिमें झाँक घाली तो घड़े मं पाणी पिन्दे पङ्योङो दिख्यो अब बो सोचण लाग्यो क ई घड़े को पाणी ऊपर कियां आ सके है, बो तिकडम बिठायी अर घड़े क आरे-सारे पड्या कान्कारा एक-एक कर आपरी चांच सूं बी घड़े मं घालण लागो, थोड़ी भाँव मं पाणी ऊपर आयो जणे पाणी पियो और उडगो
यह कहानी आप को कैसी लगी अवश्य बताएं धन्यवाद !

8 टिप्‍पणियां:

अतुल शर्मा ने कहा…

मुकेशजी आपका हिन्दी चिट्ठा जगत में स्वागत है। आप अपने ब्लॉग का पंजीयन पर ज़रूर कर लें और ऐसे ही लिखते रहें।

Sagar Chand Nahar ने कहा…

भाया मैं तो यान सुण्यौ है कि बे कांकरा कोनी गारा का टुकड़ा हा जर सघळो पाणी गारो चूस गयो अर कागलो तीसां मर ग्यौ।
सांची बात किसी है भाया?

आपरो स्वागत करां हाँ अने आपसूं बिनती है के जे काम म्हे कौनी करी सक्या आप कर र दिखावो, मतलब के राजस्थानी मां लेख लिखो। अने नैट पर राजस्थानी रो प्रचार करो।

Sanjeet Tripathi ने कहा…

स्वागत है आपका, शुभकामनाएं

प्रियंकर ने कहा…

कागलो जियांल की सूझ-बूझ करी बइयांइ सगला करै तो दिनमान सुधर जावै . पढेड़ा पढेसरी तो घणकरा मिल ज्यावै पण सूझबूझ आड़ा बेसी कोन्या दीखै .

arun ने कहा…

भाइ सम्झ मे तो आग्यो लिक्खण भी सीख ही जावेगे तम से

Shrish ने कहा…

हिन्दी चिट्ठाजगत में स्वागत है मुकेश जी । नए चिट्ठाकारों के स्वागत पृष्ठ पर भी अवश्य जाएं

http://akshargram.com/sarvagya/index.php/welcome

joglikhisanjaypatelki ने कहा…

भाईजी..जै रामजी की.आपरो चिट्ठो बांच्यो.मे मालवा को हूं..ने राजस्थानी मालवी की मां हे.आंपी प्रयत्न करता रा तो अपणी लोक-भाषा को मान वदतो रेवेगो. नी तो जस तर म्हारो छोरो पूछे कि डैड (जीता जी dead कर दियो है)अड़तीस कई वे हे.बीने फ़ोर्टी एट बोलो... जद समझ पडे हे .तो म्हें अपणी बात म्हारी बोली मालवी में की हे .पूरी उम्मीद हे कि आप समझ जाओगा.आपरी बारता खूब चोखी हे...मन राजी होगो.लिखता रेवेजो
कोई बांचे नी बांचे ...आप चिंता मत करजो..
लिखवा - बांचवा से ज बोली ..भाषा बणे हे.

थोडो़ लिख्यो हे..पूरो जाणजो.
लिखी.....
आपरो भई..
गाम इंदौर को
संजय पटेल

हिन्दी साहित्य सभा ने कहा…

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